मनुष्य अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सुख संसाधनों की पूर्ति करने में नष्ट कर देता है क्योंकि उसको लगता है महंगे संसाधनों से सुख मिलता है जबकि यह बिल्कुल गलत सोच है ।
मनुष्य जीवन भर सुख के पीछे भागता है और सुख से संबंधित हर उस चीज को पाना चाहता है जो उसे सुख दे सके पर जब मनुष्य उस चीज को पा लेने के बाद भी सुख महसूस नहीं करता तो और चीजों को पाने की अभिलाषा मनुष्य के अंदर बढ़ती जाती है।
सुख की चाहत में मनुष्य आलीशान घर बनाता है, महंगे महंगे जेवर, महंगे महंगे कपड़े और विदेशों में घूमने जाना ।यह सब कुछ सुख हासिल करने की चाहत में इंसान करता है मगर फिर भी उसे सुख महसूस नहीं होता बल्कि समस्या टेंशन और सोच विचार में मनुष्य दब जाता है ।
समाज में ऐसे कई लोग देखे हैं जो की रईस होते हैं ऐसे व्यक्तियों के बड़े-बड़े लोगों से मिलना जुलना रहता है। यहां तक कि अमीरी दिखाने के लिए लोग सोने चांदी की बर्तनों में खाना खाते हैं जबकि उनके असल जीवन में सुकून और शांति नहीं होती।
मनुष्य अपने जीवन में बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा को भी हासिल कर लेता है और समाज में एक प्रतिष्ठित आदमी बन जाता है इतना सब होने के बाद भी इंसान खुश नहीं होता।
यहां तक कि मनुष्य अपने बच्चों को जान पहचान के जरिए उनके पैरों पर खड़ा करने में मदद करता है और बहुत हद तक अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कर भी लेता है जीवन में सुख की कमी नहीं रहती और दुख दूर-दूर तक नहीं दिखता इस सब के बाद भी मनुष्य को सच्ची खुशी हासिल नहीं होती।
मनुष्य को सच्ची खुशी न मिलने का एक मुख्य कारण यह भी है कि मनुष्य हमेशा सुख को अपने बाहरी दुनिया में तलाशता है जबकि सच्चा सुख तो मनुष्य के अंदर ही छुपा हुआ होता है ।
मनुष्य जिस सच्चे सुख की तलाश में जीवन भर भटकता रहता है वह सच्चा सुख महंगी से महंगी गाड़ी वेश कीमती संसाधनों में नहीं मिलता यह सच्चा सुख मनुष्य को अपने अंदर खोजना पड़ता है।
हमने ऐसे कई मनुष्य देखे होंगे जिनके पास अपार धन दौलत होती है फिर भी उनके जीवन में शांति नहीं मिलती और हमने ऐसे भी व्यक्ति देखे हैं जिनके पास एक फूटी कौड़ी तक नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसे व्यक्ति मस्त रहते हैं क्योंकि उनके पास वास्तविक शांति होती है ।
मनुष्य को जब वास्तविक शांति का ज्ञान हो जाता है तब वह बेहतर तरीके से समझ जाता है की सच्ची खुशी मंहगे संसाधनों में नहीं बल्कि हमारे अंदर ही छुपी होती है।
संसाधनों में पड़कर व्यक्ति एक ऐसी दुनिया में जीने लगता है जिस बनावटी दुनिया का निर्माण सिर्फ दिखावे के लिए इंसानों ने किया है।
दिखावे की दुनिया का निर्माण करके इंसान उसमें स्वयं फंस चुका है इस कारण व्यक्ति प्राकृतिक दुनिया जोकि भगवान की बनाई दुनिया है उसका स्वाद लेना भूल जाता है और इस कारण वह व्यक्ति सच्चे सुख को भी समझने में देर करता है।
मनुष्य को किसी कार्य को करने से पहले दिखावे की दुनिया से पूछना नहीं पड़े और कोई भी कदम उठाने से पहले उसके मन में किसी भी तरह का डर नहीं होगा उस दिन मनुष्य को सच्चे सुख की अनुभूति होती है।
जब व्यक्ति आजाद मन से कोई भी कार्य करता है तब उसे जो खुशी मिलती है वहीं खुशी व्यक्ति के लिए सच्चा सुख साबित होती है।
सही मायने में सच्चा सुख परिवार के साथ रहने और एक साथ खाना खाने में जो है वह किसी महंगे संसाधन में नहीं मिलेगा।
सच्चे सुखी कोई कीमत नहीं होती और यह हर किसी को ना मिले ऐसा भी नहीं है । सच्चे सुख की तलाश करने वालों को अपने अंदर ही सच्चे सुख को टटोलना होगा।