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  • सच्चा सुख संसाधनों में नहीं स्वयं में है

    मनुष्य अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सुख संसाधनों की पूर्ति करने में नष्ट कर देता है क्योंकि उसको लगता है महंगे संसाधनों से सुख मिलता है जबकि यह बिल्कुल गलत सोच है ।

    मनुष्य जीवन भर सुख के पीछे भागता है और सुख से संबंधित हर उस चीज को पाना चाहता है जो उसे सुख दे सके पर जब मनुष्य उस चीज को पा लेने के बाद भी सुख महसूस नहीं करता तो और चीजों को पाने की अभिलाषा मनुष्य के अंदर बढ़ती जाती है।

    सुख की चाहत में मनुष्य आलीशान घर बनाता है, महंगे महंगे जेवर, महंगे महंगे कपड़े और विदेशों में घूमने जाना ।यह सब कुछ सुख हासिल करने की चाहत में इंसान करता है मगर फिर भी उसे सुख महसूस नहीं होता बल्कि समस्या टेंशन और सोच विचार में मनुष्य दब जाता है ।

    समाज में ऐसे कई लोग देखे हैं जो की रईस होते हैं ऐसे व्यक्तियों के बड़े-बड़े लोगों से मिलना जुलना रहता है। यहां तक कि अमीरी दिखाने के लिए लोग सोने चांदी की बर्तनों में खाना खाते हैं जबकि उनके असल जीवन में सुकून और शांति नहीं होती।

    मनुष्य अपने जीवन में बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा को भी हासिल कर लेता है और समाज में एक प्रतिष्ठित आदमी बन जाता है इतना सब होने के बाद भी इंसान खुश नहीं होता।

    यहां तक कि मनुष्य अपने बच्चों को जान पहचान के जरिए उनके पैरों पर खड़ा करने में मदद करता है और बहुत हद तक अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ कर भी लेता है जीवन में सुख की कमी नहीं रहती और दुख दूर-दूर तक नहीं दिखता इस सब के बाद भी मनुष्य को सच्ची खुशी हासिल नहीं होती।

    मनुष्य को सच्ची खुशी न मिलने का एक मुख्य कारण यह भी है कि मनुष्य हमेशा सुख को अपने बाहरी दुनिया में तलाशता है जबकि सच्चा सुख तो मनुष्य के अंदर ही छुपा हुआ होता है ।

    मनुष्य जिस सच्चे सुख की तलाश में जीवन भर भटकता रहता है वह सच्चा सुख महंगी से महंगी गाड़ी वेश कीमती संसाधनों में नहीं मिलता यह सच्चा सुख मनुष्य को अपने अंदर खोजना पड़ता है।

    हमने ऐसे कई मनुष्य देखे होंगे जिनके पास अपार धन दौलत होती है फिर भी उनके जीवन में शांति नहीं मिलती और हमने ऐसे भी व्यक्ति देखे हैं जिनके पास एक फूटी कौड़ी तक नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसे व्यक्ति मस्त रहते हैं क्योंकि उनके पास वास्तविक शांति होती है ।

    मनुष्य को जब वास्तविक शांति का ज्ञान हो जाता है तब वह बेहतर तरीके से समझ जाता है की सच्ची खुशी मंहगे संसाधनों में नहीं बल्कि हमारे अंदर ही छुपी होती है।

    संसाधनों में पड़कर व्यक्ति एक ऐसी दुनिया में जीने लगता है जिस बनावटी दुनिया का निर्माण सिर्फ दिखावे के लिए इंसानों ने किया है।

    दिखावे की दुनिया का निर्माण करके इंसान उसमें स्वयं फंस चुका है इस कारण व्यक्ति प्राकृतिक दुनिया जोकि भगवान की बनाई दुनिया है उसका स्वाद लेना भूल जाता है और इस कारण वह व्यक्ति सच्चे सुख को भी समझने में देर करता है।

    मनुष्य को किसी कार्य को करने से पहले दिखावे की दुनिया से पूछना नहीं पड़े और कोई भी कदम उठाने से पहले उसके मन में किसी भी तरह का डर नहीं होगा उस दिन मनुष्य को सच्चे सुख की अनुभूति होती है।

    जब व्यक्ति आजाद मन से कोई भी कार्य करता है तब उसे जो खुशी मिलती है वहीं खुशी व्यक्ति के लिए सच्चा सुख साबित होती है।

    सही मायने में सच्चा सुख परिवार के साथ रहने और एक साथ खाना खाने में जो है वह किसी महंगे संसाधन में नहीं मिलेगा।

    सच्चे सुखी कोई कीमत नहीं होती और यह हर किसी को ना मिले ऐसा भी नहीं है । सच्चे सुख की तलाश करने वालों को अपने अंदर ही सच्चे सुख को टटोलना होगा।

  • अपनी पहचान बनाना सीखें

    धरती पर इंसान जीवन की सारी प्रक्रियाओं को पूरा करके मृत्यु की तरफ बढ़ता है और एक दिन उसके जीवन की कहानी का अंत भी हो जाता है।

    पर कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है क्या जो मरणोपरांत भी जीवित मनुष्य के दिमाग में हमेशा के लिए जीवित रहे । तो इस सवाल का जवाब जवाब होगा‌ हां।

    कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जो अपने महान कार्यों की वजह से या फिर किसी खास महानता के कारण मरने के हजारों सालों तक हमारे दिमाग में जिंदा रहते हैं ।

    इसी प्रकार कुछ खास लोग जो कि देखने में साधारण शक्ल सूरत वाले होते हैं परंतु फिर भी अपनी अमिट पहचान की वजह से हर व्यक्ति पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

    ऐसे लोगों के जीवन में भी समस्याएं होती हैं परंतु फिर भी ऐसे व्यक्ति हमेशा हंसमुख स्वभाव के ही लगते हैं ऐसे व्यक्तियों को देखने पर ऐसा लगता है जैसे कि इनके जीवन में कोई समस्या है ही नहीं।

    हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति औरों पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में माहिर होते हैं।

    हम में से ज़्यादातर लोग अगर चाहे तो ऐसे लोगों की तरह बन सकते हैं ऐसे लोगों की तरह बनने के लिए हमें कुछ विशेषताएं अपने अंदर बनानी होगी और उसके लिए कोशिश लगातार करनी होती है।

    अपने काम से काम रखें

    जो व्यक्ति समाज में अपनी अलग पहचान बनाते हैं ऐसे व्यक्ति अपने काम से ही काम रखते हैं इन्हें किसी दूसरे के कार्यों में दखल देने की आदत नहीं होती।

    ऐसे व्यक्ति अपने काम पर ही फोकस रखते हैं और अपने काम की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के अंदर अपने काम को सुचारू रूप से और समय पर करने की आदत रहती है। दूसरे व्यक्तियों के काम में दखलअंदाजी न करने के कारण इनका समाज में अपना अलग ही रुतबा होता है।

    ना कहना सीखना

    ऐसे व्यक्ति जो ना कहना जानते हैं ऐसे व्यक्ति दिमागी तौर पर मजबूत होते हैं। इन्हें हर काम को हां कहने की आदत नहीं होती ।ऐसे व्यक्ति हर काम को बेहतर तरीके से समझते हैं और उसके बाद ही हां या ना कहते हैं।

    इसके अलावा यह खुद को अच्छा साबित करने की चाह में हर काम को हां नहीं कहते बल्कि ऐसे व्यक्ति सबसे पहले अपने आप की सुनते हैं इस वजह से यह बहुत से काम को ना कहना भी जरूरी समझते हैं ।

    मौन रहना सबकी सुनना

    अपनी खास पहचान बनाना और अपनी छाप लोगों के मन में छोड़ देना ऐसी विशेषता रखने वाले व्यक्ति ज्यादातर समय मौन ही रहते हैं ऐसे व्यक्तियों को हर वक्त बक-बक करने की आदत नहीं होती ।

    कम बोलने वाले और मौन रहने वाले व्यक्ति एक अच्छे श्रोता होते हैं और यह किसी भी समस्या की बारीकियों को समझने में माहिर होते हैं।

    समय की अहमियत समझना

    जो व्यक्ति सब पर अपनी छाप छोड़ने में माहिर होते हैं उनकी एक सबसे अच्छी आदत यह होती है कि ऐसे व्यक्ति समय की अहमियत को समझते हैं और समय की अहमियत को समझते हुए यह जरूरी काम सबसे पहले करना सही समझते हैं।

    फालतू में समय को बर्बाद करना ऐसे व्यक्ति की आदत नहीं होती । ऐसे व्यक्ति समय की अहमियत समझते हैं । समय की अहमियत समझने वाले व्यक्ति अपने खुद के लिए और समाज की बेहतरी के लिए बहुत कुछ करते हैं।

    खुद को महत्व देना

    सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं का महत्व समझना होगा जब व्यक्ति खुद के प्रति महत्व को समझने लगता है। इसके बाद महत्व ही आप अपने बारे में अच्छे-बुरे का अर्थ समझ सकेंगे।

    खुद का महत्व समझने वाले व्यक्ति दूसरों की भी इज्जत का ख्याल रखते हैं और खुद की इज्जत को भी जरूरी समझते हैं ।

    ऐसे व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को खुद का उपहास नहीं उड़ाने देते।

    ऐसे व्यक्ति अपनी कमजोरी को भी हर किसी को नहीं बताते । बल्कि अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाते हैं ।

    कम दोस्त रखना

    जो व्यक्ति व्यावहारिक तौर पर अपनी छाप दूसरों पर छोड़ जाने में माहिर होते हैं ऐसे व्यक्तियों के दोस्त भी ज्यादा नहीं होते बस कुछ गिने-चुने ही दोस्त ही इनकी पूरी दुनिया होते हैं।

    ऐसे व्यक्ति अपने दोस्तों को भी अग्रसर होने में मदद करते हैं। अपने दोस्तों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना इनका व्यवहार होता है।

    निष्कर्ष

    अपनी छाप दूसरे व्यक्तियों पर छोड़ने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को हर वक्त खुश रहना सीखना चाहिए चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आपका दोस्ताना रवैया बनाने में मदद करता है। व्यक्ति को स्वयं अपने बारे में हमेशा अच्छा ही सोचना चाहिए और दूसरा से मदद की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए।हर किसी को खुश करने में इंसान खुद को दुखी रखता है इसलिए अपनी वैल्यू बनायें और सबसे पहले खुद को प्राथमिकता देना सीखे ऐसे व्यक्तियों को दोस्त भी बहुत ज्यादा नहीं बनाना अच्छा लगता है बल्कि कुछ गिने चुनें दोस्त जो की अच्छी आदतों से पूर्ण हो ऐसे चुनाव करते हैं ।

    अगर व्यक्ति खुद पर ध्यान देना शुरू कर दे और अपनी बुरी आदतों को खत्म करके स्वयं के अंदर अच्छी आदतों का निर्माण करें तो व्यक्ति सबसे अलग अपनी पहचान बनाने में सफल हो सकता है अपने जीवन में एक दिन कामयाब भी होता है।

  • भक्ति रस में -सूर्य कथा

    भारत देश में लोगों की सुबह अपने भगवान के नाम को लेकर होती है क्योंकि भारत देश में अधिकतर व्यक्ति देवी देवताओं में अपनी गहरी आस्था रखते हैं।

    भगवान सूर्यदेव

    रविवार के दिन भगवान सूर्य देव का दिन माना जाता है। और भगवान सूर्य को जल अर्पण करके अपने जीवन के दुखों को खत्म करने और जीवन मे आए अंधियारे को मिटाने की विनती करते हैं।

    भगवान सूर्य देव से संतान पाने की कामना और संतान की दीर्घायु के लिए भी प्रार्थना की जाती है।

    जो पति-पत्नी अपने जीवन में संतान सुख से वंचित हैं या पुत्र रूप की कामना रखते हैं वे पति पत्नी भी रविवार के दिन भगवान सूर्य देव की उपासना करते हैं और व्रत भी रखते हैं।

    सूर्य देव को प्रिय

    सूर्यदेव को गुड, खिचड़ी और तिल अत्यंत प्रिय हैं अतः भक्तलोग सूर्यदेव को भोग में गुड खिचड़ी और तिल देते हैं।

    सूर्यदेव का प्रिय रंग नारंगी और लाल है। सूर्य देव को गुलाब और गुड़हल के पुष्प अत्यधिक प्रिय हैं।

    भगवान सूर्य देव की कथा

    प्राचीन काल की बात है एक गरीब बुढ़िया सूर्य देव भगवान की भक्त थीं। बुढ़िया अपने घर की साफ सफाई करती और अपने घर के आंगन को गोबर से लीपकर शुद्ध करती ।

    बुढ़िया को बहुत शांति से जीवन यापन करते देख उसकी पड़ोसन उससे हमेशा जलती रहती।

    बुढ़िया उसी पड़ोसन की गाय के गोबर से अपने घर के आंगन को लीपती । एक बार रविवार के दिन पड़ोसन ने अपनी गाय को घर के अंदर बांध दिया जिस वजह से बुढ़िया को गोबर नहीं मिला और वह अपने आंगन को भी नहीं लीप पाई।

    उस रविवार के दिन बुढ़िया ने उपवास नहीं रखा और न ही सूर्य देव को भोग लगाया।

    रात के वक्त भगवान् सूर्यदेव ने बुढ़िया से सपने में आकर पूछा तुम तो मेरी प्रिय भक्त हो और तुम नियम से मेरे व्रत को रखती हो और मुझे भोग भी लगाती हो परन्तु आज ये नियम कैसे टूटा ।जब सपने में भगवान सूर्य देव ने व्रत ना रखने और भोग न लगाने का कारण पूछा तो इस पर बुढ़िया ने कहा हे प्रभु सूर्य देव मेरी पड़ोसन ने अपनी गाय को घर के अंदर बांध दिया था जिस कारण मुझे गोबर नहीं मिला और मैं अपने घर के आंगन को लीप नहीं पाई इस वजह से मैं आपका व्रत रखने में और आपका भोग लगाने में असमर्थ थी।

    भगवान सूर्य देव को जब अपनी भक्त के व्रत ना रख पाने का कारण पता चला तो उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें आशीर्वाद से एक गाय देता हूं और यह कहकर भगवान सूर्य देव अंतर्ध्यान हो गए।

    सुबह उठकर बुढ़िया को सपने में भगवान सूर्य देव द्वारा बोले गए कथन की याद आई तो उसने अपने घर के आंगन में जाकर देखा। घर के आंगन में वाकई में एक गाय बंधी हुई थी बुढ़िया गाय को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई।

    भगवान सूर्य देव के आशीर्वाद से प्राप्त गाय एक चमत्कारी गाय थी । वह गाय प्रतिदिन सुबह के वक्त सोने का गोबर करती थी बुढ़िया की पड़ोसन ने जब यह देखा तो वह चुपचाप से जाकर सोने के गोबर को उठा लाई और उस जगह अपनी गाय के गोबर को रख आई ।वह पड़ोसन प्रतिदिन ऐसा ही करने लगी और इस तरह पड़ोसन अमीर होती गई।

    बुढ़िया को गाय के सोने के गोबर वाली बात नहीं पता थीं। सूर्यदेव ने जब प्रतिदिन पड़ोसन को सोने के गोबर की चोरी करते हुए देखा तो उन्होंने एक दिन बहुत तेज आंधी चलाई जिस कारण बुढ़िया ने अपनी गाय को घर के अंदर बांध दिया और अगली सुबह बुढ़िया ने गाय के सोने के गोबर को देखा तो वह चकित रह गई।

    गाय के सोने के गोबर की वजह से बुढ़िया के घर धन-धान्य बढ़ने लगा यह देख पड़ोसन उससे और अधिक जलने लगी। पड़ोसन ने जाकर अपने राज्य के राजा को यह बात बता दी जिससे राजा ने अपने सैनिकों को भेजकर बुढ़िया के यहां से गाय और गाय के बछड़े को लाने को कहा और बुढ़िया को बंदी बनाकर लाने को कह दिया।

    जब राजा ने दूसरे दिन अपने महल में सुबह गाय को सोने का गोबर करते हुए देखा तो राजा अचंभित हो गया। राजा के पास उस गाय के गोबर से धन-धान्य बढ़ता गया और बुढ़िया कैद में दुखी होकर रहने लगी ।

    भगवान सूर्य देव ने अपनी भक्त बुढ़िया को कैद में देखा और गाय को राजा के पास देखा तो सूर्य देव ने राजा से रात्रि में सपने में आकर कहा कि इस गाय को और बुढ़िया को छोड़ देना अन्यथा तुम्हारा सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

    सुबह होने पर राजा को सपने में भगवान सूर्य देव द्वारा कही गई बातें याद आई तो राजा ने बुढ़िया को और उसकी गाय को छोड़ दिया । राजा के आदेश से सैनिकों ने बुढ़िया को उसके घर तक छोड़ दिया।

    इसके बाद राजा ने बुढ़िया की पड़ोसन को दंड दिया और पड़ोसन से बुढ़िया को फिर कभी ना परेशान करने को भी कहा।

    इस तरह बुढ़िया को उसकी गाय प्राप्त हो गई और सूर्य देव जी ने अपनी भक्त बुढ़िया के दुख दूर किये।

  • भक्ति को भगवान का आशीर्वाद

    भक्त और भगवान का रिश्ता बड़ा ही अद्भुत और चमत्कारों से भरा हुआ है। प्राचीन काल से ही भक्त अपने भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कठिन से कठिन तपस्या करता और फलस्वरूप अपने आराध्य को मनाकर अपनी मनोकामनाओं का वरदान प्राप्त करता है ।

    भगवान भी अपने भक्त की कठिन से कठिन तपस्या को देखकर और उसके मन में अपने प्रति आदर भाव को देख कर प्रसन्न हो जाते हैं ।

    भक्त और भगवान से जुड़ी हुई अनंत कथाएं हैं।

    प्राचीन काल में असुर भी देवताओं की कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त करते थे।

    कहानी

    एक बार एक असुर महादेव जी की कठोर तपस्या करने घने जंगलों में गया और और वहां जाकर महादेव जी की तपस्या करने में तल्लीन हो गया।

    तपस्या करते-करते असुर को कई वर्ष बीत गए इस बीच भीषण आपदाएं आईं पर उस असुर की तपस्या मे कोई वाधा नहीं पड़ती।

    समय बीतता गया और असुर ने अपनी तपस्या को खत्म नहीं किया और आखिर में महादेव जी उस असुर की कठोर तपस्या को देखकर प्रसन्न हुए।

    महादेव जी ने असुर से वरदान मांगने को कहा तो इस पर असुर ने निर्भीक और निडरता का वरदान मांगा।

    महादेव जी से असुर निर्भिक और निडरता का वरदान पाकर बहुत ही प्रसन्न हुआ। असुर के अंदर अंहकार और घमंड भी बढ़ता गया असुर तपस्या द्वारा महादेव से मिले वरदान का दुरुपयोग करता गया। असुर गरीब और असहाय लोगों को पीड़ा देने लगा और उनको पीड़ित देखकर असुर बहुत प्रसन्न होता ।जब देवता और ऋषि मुनि भी उसके अत्याचारों से परेशान रहने लगे तब उन्होंने भगवान गणेश जी के पास जाना उचित समझा।

    असुर से लड़ने का और उसको रोकने का जब कोई उपाय नहीं रहा तो सभी देवताओं और ऋषि मुनियों ने भगवान गणेश जी की शरण में जाकर असुर से बचने का उपाय खोजा।

    भगवान गणेश जी ने देवताओं और ऋषि मुनियों की दुःख की व्यथा सुनी। गणेश भगवान ने अपने दिव्य और शक्तिशाली रूप को धारण किया और वक्रतुंड रूप में प्रकट हुए।

    वक्रतुंड रूप में गणेश जी ने शक्तिशाली असुर से युद्ध किया। यह युद्ध काफी वक्त चला युद्ध के दौरान गणेशजी ने अपने वक्रतुंड रूप में असुर के घमंड और अहंकार को छिन्न-भिन्न कर दिया दिया।

    फल स्वरुप गणेश जी ने असुर को उसकी गलतियों का एहसास दिलाया और उसके अहंकार को बाहर निकाल दिया ।

    असुर में भगवान गणेश जी से अपनी गलतियों की क्षमा मांगी और स्वयं का आत्मसमर्पण कर दिया।

    वक्रतुंड रूप में भगवान गणेश जी ने असुर की आत्मसमर्पित भावना से खुश होकर असुर को भक्त होने का वरदान दिया और इसी के साथ असुर की भक्ति को भी वरदान मिला।

  • भक्ति रस में – संतोषी व्रत कथा

    शुक्रवार के दिन मां संतोषी की पूजा अर्चना की जाती है।मां संतोषी की पूजा अर्चना करने से भक्त लोगों के जीवन में सुख शांति की कृपा बनी रहती है और मंगल कार्य भी समय-समय पर होते रहते हैं।

    मां संतोषी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली विपदाओं को भी मां संतोषी हर लेतीं हैं।

    इस दुनिया में सबके जीवन में भांति-भांति के दुख-सुख हैं हर व्यक्ति की अभिलाषा होती है कि उसका जीवन सुख शांति से बीते और इस अभिलाष को लेकर ही भक्ति लोग माता संतोषी से जीवन में सुख शांति की कामना करते हैं।

    संतोषी माता की कहानी

    बहुत पहले की बात है एक नामी और प्रसिद्ध राजा थे ।राजा के बारे में कहा जाता था की जो भी व्यक्ति किसी भी तरह की मदद के लिए राजा के महल में जाता तो राजा उसकी मदद करने के लिए सदा तत्पर रहते।

    इसी प्रकार उस राजा की रानी भी बहुत ही दयालु प्रकृति की थी । राजा और रानी गरीबों के सुख दुख का ख्याल रखते और अपने राज्य की हर समस्या का समाधान ढूंढते।

    राजा और रानी अपने इस कार्य की वजह से बहुत प्रसिद्ध थे। राजा पराक्रमी और साहसी था जिस कारण किसी भी शत्रु का राजा के पराक्रम का सामना करने का साहस नहीं होता था।

    राजा और रानी अपने महल में पूरी सुख-सुविधा से रहते थे परंतु राजा रानी के जीवन में एक बहुत बड़ा दुख भी था वह दुख था संतान सुख शादी के काफी वक्त गुजर जाने के बाद भी राजा और रानी इस सुख से वंचित थे।

    राजा और रानी मां संतोषी में गहरी आस्था रखते थे और पूरा दिन मां संतोषी की पूजा करते।

    एक बार की बात है राज्य में अकाल पड़ गया जिस कारण पूरे राज्य की फसल भी नष्ट हो चुकी थी ।राजा को अकाल से आई समस्या के बारे में और फसल नष्ट हो जाने के बारे में पता चला तो राजा बहुत ही दुखी हुए।

    प्रजा के दुख को देखकर राजा ने अपने महल के तहखाने में रखा अनाज गरीबों में बंटवाया लेकिन अपने लिए एक अन्न का दाना नहीं रखा जिससे कि प्रजा भूखी न रहे राजा के इस निर्णय से प्रजा बहुत खुश हुई और दुखी भी हुई की राजा रानी इतने दयालु होने के बाद संतान-सुख से वंचित हैं।

    राजा और रानी के इस त्याग और व्यवहार से संतोषी माता अति प्रसन्न हुईं।

    संतोषी माता ने राजा और रानी को सपने में आकर कहां कि जिस तरह राज्य में आई भुखमरी को खत्म करने के लिए तुमने अपने तहखाने के सारे अनाज को प्रज्ञा में बंटवा दिया यह देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुई और इसके साथ ही मैं तुम दोनों की भक्ति से भी प्रसन्न हूं में वरदान देती हूं की कुछ समय में ही तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा और यह कहकर संतोषी मां आलोप हो गईं।

    इसके बाद कुछ समय बीत जाने पर राजा और रानी के जीवन में संतान सुख आ गया।

    अब राजा और रानी का मां संतोषी की भक्ति भाव में श्रद्धा बढ़ गई और इसके साथ ही राजा और रानी अपने प्रजा के सुख-दुख में साथ देने लगे और प्रजा के बच्चों को अपनी संतान समान मानने लगे।

    राजा और रानी के जीवन में संतान सुख मां संतोषी के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ और मां संतोषी का आशीर्वाद राजा और रानी के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर मिला।

    मां संतोषी ने जैसे राजा और रानी के जीवन में संतान सुख दिया ऐसे ही मां संतोषी अपने भक्तों के जीवन में हर दुख को हर लेती हैं और उसकी जगह सुख को देती हैं। जय संतोषी माता की।

  • भक्ति रस में -श्री विष्णु कथा

    बृहस्पतिवार के दिन श्री विष्णु जी की पूजा की जाती है। श्री विष्णु जी अपने भक्त की इच्छा को पूर्ण करते है। श्री विष्णु जी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को घर धन-धान्य से संतान-सुख से निरोगी काया से और इसके अलावा सारे सुखों से खुश रखते हैं।

    बृहस्पति व्रत के नियम

    बृहस्पतिवार के दिन बहुत से भक्त श्री विष्णु जी का व्रत रखते हैं और पूजा अर्चना करते हैं।

    बृहस्पतिवार व्रत के नियम बहुत ही सरल और कम खर्च वाले हैं जिस कारण भक्त इन नियमों को सरलता से पूर्ण कर लेते हैं।

    बृहस्पति व्रत में सुबह अपने जरूरी कार्य से निवृत होकर और नहा कर पीला वस्त्र धारण करते हैं और केले के पेड़ के नीचे बैठकर हाथों में चने की दाल लेकर श्री विष्णु जी की कथा सुनते हैं।

    बृहस्पतिवार के दिन स्त्रियों को बाल धोने की मना होती है। इस व्रत में आटे में हल्दी और चने की दाल डालकर लोई बनाकर गाय को दी जाती है।

    इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति एक वक्त का खाना खा सकता है पर पीला भोजन जरूरी माना गया है जैसे की केला ,आम इसके अलावा खाने के आटे में जरा सी हल्दी डालकर खाने के लिए परांठा बनाया जा सकता है।

    श्री विष्णु कथा

    एक बार की बात है एक गांव में एक गरीब स्त्री अपने पति के साथ और अपने एक पुत्र के साथ टूटी सी झोपड़ी में रहा करती थी।

    दोनों पति-पत्नी दिन भर मेहनत करके कुछ रुपए कमाते और फिर अपने खाने के लिए सामान लाकर भोजन पकाते वे अपने जीवन से काफ़ी खुश रहते।

    स्त्री हर बृहस्पतिवार को श्री विष्णु जी की आराधना करती और सच्चे मन से व्रत रखती परंतु स्त्री के पति को अपनी पत्नी का श्री विष्णु जी का व्रत रखना और आराधना करना ठीक नहीं लगता था वह अपनी पत्नी को पूजा पाठ करने से सदा रोकना रहता।

    पर पत्नी प्रेम से अपने पति को समझाती और कहती श्री विष्णु जी की दया से ही हमारे जीवन में सुख-शांति है इस पर पति कहता अगर हमारे जीवन में सुख शांति श्री विष्णु जी की कृपा से है तो हम अभी तक गरीब क्यों हैं। यह कहकर वह अपनी पत्नी से रुष्ट हो जाता।

    एक बार पति की तबीयत खराब हो गई और वह काम पर भी नहीं जा सकता था पत्नी अकेले ही काम पर जाती और घर के सारे काम करती कुछ दिन निकल जाने के बाद भी पति की तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ यह देखकर पत्नी भी परेशान रहने लगी क्योंकि पति को क्या हुआ यह समझ नहीं आ रहा था।

    पति की तबीयत खराब हो जाने की वजह से अब उनके दिन और खराब होने लगे और यहां तक की खाने के लिए भी तरसना पड़ता तब एक दिन पति ने कहा कि तुम तो कहती थी श्री विष्णु जी की कृपा से हम सुख शांति से रहते हैं तो अब हमारे जीवन से सुख शांति कहां गया । इस पर पत्नी के पास कोई जवाब नहीं था और वह चुपचाप सुनती रही ।

    कुछ दिन बाद की बात है पत्नी पड़ोसियों से मांग कर कुछ खाना लेकर आई और अपने पति और बालक के साथ खाने बैठी ही थी की तभी झोपड़ी के दरवाजे पर किसी ने आवाज़ दी ।पत्नि ने बाहर जाकर देखा तो एक बूढ़ा व्यक्ति कुछ खाने के लिए मांग रहा था तो पत्नी ने बिना सोचे समझे अपने हिस्से का खाना उसे बूढ़े को खाने के लिए दे दिया ।इस पर उस बूढ़े ने कहा कि पुत्री तुमने मुझे अपने हिस्से का खाना दे दिया है अब तुम क्या खाओगी इस पर उस स्त्री ने कहा बाबा आज तो बृहस्पतिवार का दिन है और मेरा आज व्रत है।

    बूढ़े व्यक्ति के रूप में श्री विष्णु जी उस औरत की परीक्षा लेने आए थे और श्री विष्णु जी की परीक्षा में गरीब स्त्री पास हो गई यह देखकर श्री विष्णु जी प्रसन्न हुए और बृहस्पति देव ने अपने रूप में आकर ग़रीब स्त्री को दर्शन दिए।

    श्री विष्णु जी के दर्शन देख पति भी अपनी झोपड़ी से बाहर निकल आया और बोला हे भगवान मुझे माफ करना मै अपनी पत्नी को आपकी पूजा करने से रोकता था और शायद इसी वजह से मेरी तबीयत खराब रहने लगी मैं समझ चुका हूं भगवान मेरी तबीयत खराब होना मेरे ही कर्मों का फल है ।श्री विष्णु जी दोनों पति-पत्नी और बालक को जीवन के सातों सुख मिलने का आशीर्वाद दिया और उनके जीवन से सारी कष्ट खत्म हो जाए ऐसा आशीर्वाद भी दिया। बृहस्पति देवता श्री विष्णु जी आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गए।

    भक्त जब अपने भगवान जी की पूजा अर्चना करने में ध्यान लगाता है तो भगवान भी प्रसन्न होकर अपने भक्त को खुशियों का आशीर्वाद देते हैं।

  • भक्ति रस में -गणेश कथा

    बुधवार का दिन भगवान गणेश की का बार होता है भगवान गणेश जी बुद्धि के देवता माने जाते हैं और अपने भक्त पर जब दयाल होते हैं तो उसके घर में धन दौलत की बरकत होती है।

    भगवान गणेश जी की जो कोई व्यक्ति नियम के साथ पूजा अर्चना करता है तो भगवान गणेश जी उसकी बुद्धि को बढ़ाकर सत्कर्म मार्ग पर ले जाते हैं और ऐसे व्यक्ति का भगवान श्री गणेश हमेशा साथ देते हैं।

    जिस घर में भगवान् गणेशजी को पूजा जाता है उस घर में माता लक्ष्मी जी स्वयं निवास करती हैं क्योंकि माना जाता है भगवान गणेश जी को जहां पूजा जाता है वहां भगवान गणेश जी के साथ लक्ष्मी जी भी जाती है।

    गणेश कथा

    बहुत पहले की बात है एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी । बूढी अम्मा अपनी छोटी सी कुटिया में अकेली रहती थी परिवार के नाम पर वह अकेली थी।

    वह बूढी अम्मा भगवान श्री गणेश में गहरी आस्था रखती थी। प्रतिदिन भगवान श्री गणेश जी की आराधना करती। भगवान गणेश जी की आराधना करने के लिए सर्वप्रथम अपने हाथों से मिट्टी की भगवान गणेश जी की मूर्ति बनाती और उसके बाद गणेश जी की विधि-विधान से पूजन करती ।

    प्रतिदिन गणेश जी की पूजा करने के बाद दोपहर में मिट्टी से बनी भगवान गणेश जी की मूर्ति टूट जाती जिस कारण है बूढी अम्मा दुखी रहती। वह हर बार अच्छी मूर्ति बनाने की कोशिश करती और हर बार उसके द्वारा बनाई हुई मिट्टी की मूर्ति टूट जाती ।यह देखकर वह भगवान गणेश जी से मूर्ति टूट जाने का कारण पूछती और विनती करती कि अगली बार भगवान गणेश जी की मूर्ति ना टूटे।

    एक बार की बात है उसी गांव के साहूकार का घर बन रहा था घर बनाने के लिए मजदूर आए हुए थे ।बूढी अम्मा मजदूरों को काम करते देखकर उनके पास आकर बोली की क्या तुम मेरे लिए भगवान गणेश जी की पक्की मूर्ति बना दोगे ।यह सुनकर मजदूर हंसने लगे और बोले की अम्मा हमारे पास बहुत काम है ऐसे फालतू के काम करने के लिए हमारे पास समय नहीं है मजदूरों से यह बात सुनकर बूढी अम्मा वहां से चुपचाप चली गई।

    मजदूर अपने काम में लग गए। मजदूर दीवार को बना रहे थे पर दीवार बार-बार टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती जिस वजह से मजदूर परेशान हो गए दो-तीन दिन यही चलता रहा साहूकार ने आकर मजदूर को देखा और पूछा कि दीवार अभी तक क्यों नहीं बनी तो मजदूरों ने कहा पता नहीं क्यों साहूकार जी हम दीवार को बार-बार तोड़ कर सही बनाने की कोशिश कर रहे हैं परंतु बार-बार दीवार टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है।

    मजदूरों में से एक मजदूर ने साहूकार से कहा की कुछ दिन पहले एक बूढ़ी अम्मा आईं थीं और हमसे भगवान गणेश जी की पक्की मूर्ति बनाने की कह रही थी ।पर हमने मना कर दिया शायद इस वजह से हमारी दीवार सीधी नहीं बन रही साहूकार यह सुनकर बूढी अम्मा की कुटिया में गया और कहने लगा की अम्मा मैं आपके लिए संगमरमर के पत्थर की भगवान गणेश जी की मूर्ति बनवा दूंगा यह सुनकर बुद्धि अम्मा प्रसन्न हो गई।

    कुछ दिन पश्चात साहूकार भगवान गणेश जी की संगमरमर के पत्थर की मूर्ति बनवा कर ले आया और बूढी अम्मा को दे दी । अब बूढी अम्मा उस संगमरमर की मूर्ति की पूजा करती और प्रसन्न रहने लगी।

  • भक्ति रस में: हनुमान कथा

    मंगलवार को वीरवार भी कहां जाता है और इसको वीरवार कहने के पीछे का कारण हनुमान जी को वीर हनुमान कहने की वजह है।

    मंगलवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति को चोला चढ़ाया जाता है और बूंदी के लड्डू का प्रसाद वितरण किया जाता है।

    राम भक्त हनुमान

    रामायण में हमने देखा और पढ़ा भी है कि किस तरह हनुमान जी ने सेवक बनकर भगवान राम की सेवा की और भगवान राम के अनंत कार्य भी किए।

    हनुमान जी भगवान राम जी के कार्यों के लिए सदा तत्पर रहते और शीघ्रातिशीघ्र कार्य करने के लिए आतुर रहते।

    हनुमान जी अपने आराध्य राम जी के साथ रहने में ही और उनके कार्य करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य समझते।

    हनुमान कथा

    रामायण में श्री राम और भक्त हनुमान के कई वृतांत है उन्हीं में से एक इस प्रकार है-

    एक बार की बात है माता सीता अपने केशों को बना रहीं थीं कि तभी हनुमान जी किसी कार्य बस माता सीता के पास आए और कुछ समय के लिए माता सीता के पास ही विश्राम करने बैठ गए।

    माता सीता को केश सज्जा करते देख हनुमानजी अति प्रसन्न हो रहे थे ।माता सीता जी केश सज्जा के बाद अपने हाथ की उंगली से सिंदूर लेकर अपनी मांग को भरने लगी यह देखकर उत्सुकता वश हनुमानजी ने माता सीता से मांग में सिंदूर भरने का कारण पूछा तो इस पर सीता माता पहले तो हंस पड़ी और उसके बाद कहने लगीं मैं अपने आराध्य श्रीराम की दीर्घायु के लिए अपनी मांग में सिंदूर लगाती हूं इससे भगवान श्री राम की आयु बढ़ेगी ।

    हनुमान जी यह सुनकर बहुत खुश हुए और सोचने लगे कि मेरे प्रभु श्रीराम जी की माता सीता जी के जरासे सिंदूर लगाने से आयु बढ़ जाती है तो क्यों ना मैं अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाऊं जिससे मेरे प्रभु श्रीराम जी की आयु और अधिक बढ़ने लगेगी यह सोचकर हनुमान जी वहां से चले गए।

    अगले दिन हनुमान जी पूरे शरीर पर सिंदूर लगाकर श्री रामजी के आगे आये ।श्री राम जी ने जब हनुमान जी को सिंदूर लगाए हुए देखा तो हनुमान जी से इसका कारण पूछा तब हनुमान जी ने बताया कि सिंदूर लगाने से प्रभु जी आपकी आयु बढ़ेगी इस कारण मैंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया है यह सुनकर श्री राम जी ने कहा हनुमान तुम्हें यह किसने बताया तब हनुमान जी ने कहा माता सीता जी रोज अपनी मांग में सिंदूर भरतीं हैं और उन्होंने ही मुझे बताया।

    श्री राम जी हनुमान जी की इस भक्ति को देखकर बहुत प्रसन्न हुए भगवान श्री राम जी ने हनुमानजी को वरदान दिया कलयुग में भक्त तुम्हें चोला चढ़ाया करेंगे जिसमें तुम्हारे पूरे शरीर पर सिंदूर लगाया जाया करेगा यह सुनकर हनुमान जी अति प्रसन्न हुए।

    इस तरह से हनुमान जी को सिंदूर लगाने का वरदान स्वयं श्री राम जी ने दिया है।

  • भक्ति रस में : महाकाल नगरी उज्जैन

    मध्य प्रदेश जिसे भारत का हृदय भी कहा जाता है और जिसमें मध्य प्रदेश की आत्मा बसती है ।उज्जैन शहर के बारे में ऐसा कहा जाता है। उज्जैन में स्थित महाकाल मंदिर जिसका जितना गुणगान किया जाए उतना ही कम है।

    शिप्रा नदी किनारे बसा यह नगर और मंदिर जिसे महादेव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक ज्योतिर्लिंग माना जाता है जो कि उज्जैन मंदिर में स्थित है।

    उज्जैन मंदिर

    उज्जैन मंदिर या कहो महाकाल मंदिर या फिर देवों के देव महादेव की नगरी यहां भक्तों ने भक्ति के प्रेम में रंगकर अपने आराध्य को कई नाम दिए हैं । यहां प्रतिदिन हजारों लाखों की संख्या में भक्त महाकालेश्वर मंदिर में अपने देव महादेव जी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    महाकाल की नगरी उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर की एक विशेषता है यहां शवों की चिताओं से मिली राख से महाकाल का श्रंगार किया जाता है और आरती भी की जाती है।

    बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में माना जाता है और इस मंदिर में भगवान् महाकालेश्वर का मुख दक्षिण दिशा की ओर है।

    महाकालेश्वर मंदिर का रहस्य

    महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े कई रहस्य भी हैं जो कि समय-समय पर मानव जाति को इन रहस्यों पर सोचने पर मजबूर कर देती है।

    महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भक्त लोग प्रसाद में चढ़ावे के रूप में मदिरा चढ़ाते हैं और महाकालेश्वर की मूर्ति को भक्त स्वयं अपने हाथों से मदिरा पिलाते भी हैं और कहते हैं महाकालेश्वर इस मदिरा का रस पान भी करते हैं। इस कारण भक्त लोगों की महाकालेश्वर मंदिर से गहरी आस्था और लगाव है।

    बाबा महाकालेश्वर का श्रृंगार और आरती जलाए गए शव की राख से होता है।

    महाकालेश्वर की इस आरती के दर्शन के लिए बहुत दूर से भक्त आते हैं।

    महाकालेश्वर मंदिर को लेकर भक्ति और आस्था से जुड़े ऐसे कई रहस्य प्रचलित हैं।

    मृत्यु से मोक्ष

    मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के रहस्यों के साथ-साथ मृत्यु से मोक्ष भी प्राप्त होता है । महाकालेश्वर के दर्शन मात्र से मृत्यु सय्या पर पड़े व्यक्ति के संकट कट जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त होता है ऐसा कहा जाता है। इस तरह भगवान महाकाल अपने भक्तों के जीवन में आए संकट को दूर करते हैं और मृत्यु के समय बुरे कर्मों के पापों को भोगने से मोक्ष दिलाने में सहायक बनते हैं।

    12 सालों में कुंभ का मेला भी उज्जैन में ही लगता है इसका एक कारण उज्जैन नगरी को पवित्र और आस्था की दृष्टि से धार्मिक माना जाता है।

    उज्जैन में आकर भक्त लोग अपने पापों को पवित्र नदी में नहा कर धोते हैं और महाकाल के दर्शन करके अपनी अकाल मृत्यु के संकट को दूर करने की प्रार्थना भी करते हैं।

    आस्था और धार्मिक

    उज्जैन को महाकाल की नगरी कहां जाता है और भगवान महाकालेश्वर स्वयं अपनी नगरी का ध्यान रखते हैं भक्त लोगों में ऐसी आस्था और धार्मिक विश्वास है।

    पुराने समय में माना जाता है उज्जैन नगरी में वेद ज्योतिष आयुर्वेद धार्मिक यज्ञ अनुष्ठान की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी।

    ऐसी आस्था और धार्मिक विश्वास आज भी यहां रहने वाले व्यक्तियों के मुख से सुना जाता है।

    महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का वर्णन जितना हो उतना कम ही लगता है। महाकालेश्वर मंदिर से भक्तों की गहरी आस्था है।

    भारत देश में कई धर्म के लोग हैं। लेकिन हिंदू सबसे पुराना धर्म माना जाता है और हिंदू धर्म से जुड़ी धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं।

  • शनि देव की कथा

    शनि देव की महिमा के बारे में हम सब भली-भांति जानते हैं। हम सभी अपने घर की सुख शांति के लिए शनिवार के दिन शनिदेव का प्रकोप कम करने के लिए शनि देव मंदिर में जाकर तेल का दीपक जलाया जाता है।

    शनि की साढ़ेसाती

    शनि देव को सूर्य का पुत्र माना जाता है ।शनि देव को काम काज यानी कि कर्म का देवता माना जाता है।शनि देव महाराज कर्म शील व्यक्ति को ही अपना प्रिय मानते हैं । शनिवार के दिन और,शनि अमावस्या पर व्रत रखकर भक्त लोग शनिदेव को प्रसन्न करते हैं और अपने जीवन में शनि देव की कूदृष्टि से बचने का उपाय भी करते हैं।

    गुस्सैल और कृपामयि शनि देव

    शनि महाराज किसी भी व्यक्ति को उसके कर्मों के हिसाब से फल देने का अधिकार रखते हैं। अक्सर लोगों में यह गलतफहमी रहती है कि शनि देव सिर्फ बुरे कर्मों का ही फल देते हैं जबकि ऐसा नहीं होता।

    अगर किसी व्यक्ति को जब पता चलता है कि उसके उपर या उसकी कुंडली में शनि की दशा खराब है तो वह व्यक्ति विचलित हो जाता है क्योंकि शनि देव को सभी ग्रहों में और सभी देवताओं में से गुस्सैल और क्रोधित स्वभाव का माना जाता है ।

    शनि देव महाराज हर किसी व्यक्ति पर क्रोधित नहीं होते बल्कि अपने भक्तों पर कर्म के हिसाब से कृपा और धन भी बरसते हैं।

    कथा

    शनि देव भगवान की वैसे तो कई कथाएं हैं और सभी कथायें प्रचलित भी हैं। एक प्रचलित कथा जो कुछ इस प्रकार है।

    शनि देव के पिताजी सूर्य देव जिनका विवाह राजा दक्ष की पुत्री संज्ञा के साथ हुआ था विवाह उपरांत भगवान सूर्यदेव को पत्नी संज्ञा से तीन पुत्र हुए जो वैस्वमन, यमराज और यमुना थे।

    सूर्यदेव भगवान का स्वभाव बहुत गर्म और तेज अग्नि के समान था सूर्य देव के इस व्यवहार को देखकर पत्नी संज्ञा परेशान रहती थीं और चाहती थीं कि पति सूर्य देव का अग्नि समान तेज और गर्म व्यवहार शांत रहे उसके लिए है कोशिश करती थीं।

    एक बार की बात है उन्हें एक उपाय समझआया इस उपाय को पूरा करने के लिए पत्नी संज्ञा ने अपनी ही जैसी हमशक्ल स्त्री बनाई और उसका नाम स्वर्णा रख दिया ।

    पत्नी संज्ञा स्वयं तपस्या करने हेतु चली गई और अपनी हमशक्ल परछाई को भगवान सूर्यदेव और पुत्रों के बारे में कार्य भी समझा गईं परछाई स्वर्णा ने भी सूर्य देव पत्नी संज्ञा को निश्चिंत होकर जाने को कहा और वादा किया कि यहां किसी को नहीं पता चलेगा की मैं आपकी परछाई हूं।

    सूर्यदेव पत्नी संज्ञा तपस्या में लीन हो गईं और उधर परछाई स्वर्णा भगवान् सूर्य देव के साथ पत्नी रूप में रहने लगीं और भगवान सूर्यदेव जी को भी स्वर्णा पर शक नहीं हुआ।

    भगवान सूर्य देव को परछाई स्वर्णा से तीन पुत्र प्राप्त हुए जिनमें से एक पुत्र शनि थे जो की शनिदेव कहलाए ।

    बचपन में शनिदेव पिता सूर्य देव के तेज का सामना करने में सक्षम नहीं थे और उन्हें देखकर घबरा जाते थे । दूसरी तरफ पिता सूर्य देव भी शनि देव के वर्ण को देखकर अपनी पत्नीसे कहते यह मेरा पुत्र कैसे हो सकता है और अपनी पत्नी की बेइज्जती करते शनि देव अपनी मां की अवेहलना होते देख पिता सूर्य देव से रुष्ट रहते ।

    शनि देव जंगल में जाकर शिवजी की तपस्या करने लगे उनकी कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा तब शनि देव ने कहा प्रभु जी मेरे पिता सूर्य देव मेरी मां का अपमान करते हैं और मुझे अपना पुत्र भी नहीं समझते इसलिए मुझे पिता सूर्य देव से अधिक पूजनीय और शक्तिशाली होने का आशीर्वाद दीजिए ।

    इस पर भगवान शिव जी ने शनि देव को नौ ग्रहों में सर्वक्षेष्ठ ग्रह होने का वरदान दिया और न्याय की दृष्टि से भी शनि देव को श्रेष्ठ ग्रह होने का वरदान दिया।

    इस प्रकार शनि देव ने पिता सूर्य देव के व्यवहार से रुष्ट होकर अपना एक स्थान बनाया।

    शनि देव न्याय के देवता हैं और वह हमारे अच्छे-बुरे कर्मों के हिसाब से ही न्याय देते हैं।