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  • वृक्षों का काटना

    यह तो हम सब अच्छे से और भलि भांति जानते हैं की वृक्ष हमारे जीवन के लिए कितना फायदेमंद है।वृक्ष हमारे जीवन में कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं। क्या कभी कल्पना की है कि बिना पेड़ों के हमारी धरती कैसी लगेगी । पृथ्वी की सुंदरता में भी वृक्ष महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    परंतु कुछ सालों से पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन के हादसों में बेतहाशा वृद्धि हुई है । भूस्खलन होने की वजह है वनों की अत्यधिक कटाई होना जिस कारण पहाड़ों की जड़ें कमजोर हो जाती है और भूस्खलन जैसे हादसे होते हैं और इस कारण जनजीवन भी प्रभावित होता है ।

    कभी-कभी पहाड़ो पर वृक्षों की कटाई सड़कों के निर्माण करने के लिए की जाती है इसलिए सरकार को चाहिए कि जहां भी सड़कों का निर्माण होता है उसे जगह की वृक्षों को इस हिसाब से काटा जाए जिससे कि पेड़ों की जड़े ना कटें जिससे स पहाड़ों में खोखलापन आने की समस्या कम होगी।

    ध्यान रहे वृक्ष है तो जीवन है इसलिए कोशिश करनी चाहिए की वृक्ष कटाई कम से कम हो ।पुराने वक्त में जब वनों की वृक्षों की कटाई ना के बराबर होती थी उसे वक्त प्रदूषण भी नहीं था और कोई भी सांस लेने से संबंधित बीमारी नहीं हुआ करती थी।

    समय रहते हमें वृक्षों की अत्यधिक कटाई की रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम उठाना पड़ेगा। वरना पछताना पड़ेगा। वृक्ष हमारे पृथ्वी पर अमूल्य संपदा है जो कि समय-समय पर मानवजीवन की जड़ भी बना है ।

    मनुष्य जीवन के अलावा जीव जंतुओं का जीवन भी वृक्षों पर आधारित है इसलिए समझना होगा एक वृक्ष हमारे और पृथ्वी के जीवजंतुओं के लिए कितना उपयोगी है।

    मनुष्य को चाहिए कि वह पेड़ों को लगाएं और अपने आसपास के व्यक्तियों को भी वृक्षों की उपयोगिता के बारे में बताए जितने अधिक पेड़ लगेंगे उतना ही ऑक्सीजन लेवल बढ़ेगा जो कि हमारे लिए फायदेमंद रहेगा इसके अलावा वातावरण भी साफ और स्वस्थ होगा ।

  • पंडवानी शैली और तीजन बाई

    तीजन बाई जो अपने तंबूरे के साथ पंडवानी शैली में गायन करती और यही से उन्हें अपनी एक पहचान मिली तीजन बाई जो कि अब हमारे बीच नहीं रहीं।

    तीजन बाई का जन्म स्थान इस्पात नगरी भिलाई के करीब ही माना जाता है । तीजन बाई अपने पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं ।तीजन बाई पारधी जाति की थीं पारधी जाति को आखेट तथा पक्षियों को पकड़ने के लिए जाना जाता है। और पारधी जाति अब घूमंतु जाति मानी जाती है।

    तीजन बाई को कभी अपने अनपढ़ होने का मलाल नहीं था तीजन बाई को पंडवानी विरासत में मिली थी उनके नाना बृजलाल पारधी पंडवानी कहते थे ।तीजन बाई बचपन से ही अपने नाना से पंडवानी सुनती थी और यहीं से उन्हें पंडवानी कंठस्थ हो गई।

    शुरुआत में तीजन बाई को पंडवानी की दक्षिणा में ₹10 मिलें जो कि उनकी पहली कमाई थी तीजन बाई कृष्ण की भक्ति करतीं थीं।

    तीजन बाई को पहचान पंडवानी शैली में गायन करने से मिली थी। मात्र 13 वर्ष की उम्र में तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के मंच पर महाभारत की कथाएं सुनाई ।

    जब तीजन बाई मंच पर अपनी तंबूरे के साथ और पूरे जोश के साथ दुशासन वध, कर्ण वध और द्रोपदी चीर हरण जैसे प्रसंगों को सुनाती तो ऐसा लगता है जैसे हर किरदार जीवन्त हो उठता ।

    लेकिन हर सफलता के पीछे संघर्ष भी होता है ऐसे ही तीजन बाई को सफल होने के पीछे संघर्ष से भी लड़ना पड़ा उन्हें अपने पहले पति से अलग होना पड़ा और दूसरा पति भी धोखेबाज निकला।

    यहां तक कि तीजन बाई को सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने की सजा भी मिली उन्हें आदिवासी समाज ने बहिष्कृत कर दिया था ।

    तीजन बाई ने एक बार कहा था कि अगर वह पढ़ी-लिखी होती तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती लेकिन सरस्वती मइया की कृपा से पंडवानी ही मेरी जिंदगी हो गयी ।इच्छा शक्ति से कोई भी सीमा पर की जा सकती है ऐसा उनका मानना था।

  • जीना चाहिए हर पल

    हम अपनी जिंदगी में घड़ी की सूई की तरह जीवन भर तयशुदा ज़िन्दगी जीते हैं। धरती पर ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है जो कि अपने जीवन में कुछ पाने की मशक्कत न करता हो ।हर किसी को अपने से आगे व्यक्ति को देखकर आगे निकलने की होड़ में , अच्छा भविष्य बनाने की ज़िद में अपने वर्तमान के पलों को नहीं जीता।

    आखिर क्या चाहिए इंसान को जिसे पाने के चक्कर में अपने हर पल को जी ना भूल चुका है ।क्या सबसे बड़ी खुशी सिर्फ सबसे आगे निकलने में ही मिलती है या फिर कुछ बड़ा काम करने में ही मिलती है।

    जी नहीं ऐसा है बल्कि हमारी जिंदगी की असली खुशी जीवन के हर पल को जीने से मिलती है हम अपने जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपनों की जिम्मेदारी निभाने में खर्च कर देते हैं। जिस वजह से हम अपने आप को लगभग भूल सा जाते हैं क्या हमारे शौक हैं क्या हमारी पसंद है क्या नापसंद है किस चीज से हमें फर्क पड़ता है या फर्क नहीं पड़ता यह सब हम भूल जाते हैं।

    लेकिन कुछ तरीके अपनाकर अगर हम चाहे तो अपने जीवन के हर पल को जी सकते हैं। इसके लिए हमें कुछ ज्यादा करने की जरूरत नहीं होती याद करो जब हम बचपन में छोटे थे तो क्या हमें ज्यादा दोस्तों की जरूरत होती थी या फिर महंगे खेल खिलौने की जी नहीं ऐसा कुछ भी हमें नहीं चहिए होता था लेकिन फिर भी हम अपने जीवन के हर पल को जीते थे।

    सबसे पहले खुद को व्यवस्थित करना सीखना चाहिए और अपने लिए वक्त भी निकालना सीखें उसके बाद कुछ वक्त के लिए टीवी पर मनोरंजन के लिए जैसे फिल्म या नाटक देख सकते है इसके अलावा इंसान के अंदर कुछ खासियत होती है जिस वजह से वह औरों से अलग होता है और वही खासियत उसकी ताकत भी बन सकती है। इसलिए अपनी पहचान भी करना सीखे।

    जीवन के हर पल को जीने के लिए हमें एक फ्रेंड सर्कल भी बनाना चाहिए जहां हम छोटी छोटी बातों पर मजाक कर सके ।

    दोस्तों जीवन जीने के लिए होता है अतः इसे यूं ही दुखों में ना व्यतीत करें बल्कि अपने जीवन के हर पल को उत्साह और खुशी के साथ जीना आना चाहिए और जरा जरा सी बातों में निराश होना भूल जाना चहिए।

  • report card

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  • हास्य कार पर होड़ टीआरपी की

    पहले कभी हास्य समाज को एक कड़वा सच का आईना दिखाता था और समाज को कड़वे सच के साथ आने वाले वक्त से रूबरू कराता था और चेतावनी भी देता था।

    हास्य कार कहो या व्यंग्यकार पर जब ये सत्ता से सवाल पूछता था और साथ में उसकी कमियों पर चोट करता था। तब लोगों को हास्य के साथ साथ सोचने पर भी मजबूर करता था ।

    पर अब समय बदल चुका है सोशल मीडिया का समय है उसके साथ ही हास्य कार और व्यंग्यकार व्यंग्य करने का तरीका भी बदल चुका है।

    पहले के वक्त में हास्य में मर्यादाएं रखी जाती थी। जो कि अब कहीं खो गई हैं। और यह सब कुछ टीआरपी पाने की अभिलाषा में हो रहा है ।

    सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में मनोरंजन की सीमा लांघकर अश्लीलता, सामाजिक मर्यादाओं का हरण सा हो रहा है।

    कुछ व्यंग्यकार का सामाजिक मुद्दों पर सार्थक हास्य प्रस्तुति करने के बजाय ऐसे मुद्दों का सहारा ले रहे हैं जिससे किसी व्यक्ति या समुदाय की मानवीय गरिमा को ठोस पहुंचती है और इससे उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता।

    पहले जहां रचनात्मक विचार और प्रतिभा को सफलता का आधार माना जाता था अब वहां चौंकाने वाले विवादास्पद उत्तेजक कंटेंट को अधिक महत्व मिलने लगा है।

    सोशल मीडिया पर लगभग-लगभग 50 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया के उपयोगकर्ता हैं । ऐसे में डिजिटल कंटेंट मैं दिखाए गए विचार और व्यवहार धीरे-धीरे समाजिक मानक बन जाते हैं।

    समय है आवश्यकता प्रतिबंधों से अधिक स्वयं पर नियंत्रण करने की और हमें तय करना होगा कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं जो दूसरों की गरिमा पर हंसे या हास्य के माध्यम से बेहतर प्रेरणा देता हो।

  • कितना जरूरी है जीवन में अनुशासन

    अनुशासन में रहकर व्यक्ति सफल हो सकता है या फिर कहे सफलता का मंत्र अनुशासन ही है । अनुशासन कोई पाठ नहीं है जिसे आपने एक बार पढ़ लिया और वह आपको याद हो जाए ।अनुशासन का मतलब वैसे तो हम सब अच्छी प्रकार भलि भांति जानते हैं।

    अक्सर मनुष्य अनुशासन को सफल होने का साधन मानता है और मनुष्य सोचता है कि अनुशासन में रहकर कुशल नागरिक ही नहीं बल्कि अनुशासन उसे जीवन में अच्छी उपलब्धियां भी दिलाता है। जिससे कि वह समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके।

    वैसे मनुष्य अनुशासन में रहकर और अनुशासित होकर अपने जीवन में हर उपलब्धि को पा सकता है और यह सत्य भी है लेकिन क्या सिर्फ अनुशासन का अर्थ उपलब्धि पाना ही है क्या अनुशासन हमारी आत्मा से नहीं जुड़ा ?

    अनुशासन में रहकर मनुष्य शांत और कुशल व्यक्तित्व प्राप्त करता है वाकई क्या सही है या ग़लत है और क्या उचित है क्या अनुचित है यह सब मनुष्य धीरे-धीरे समझने का प्रयास करता है ।

    सदियों से मनुष्य ने समझने का प्रयास किया है कि अनुशासन जीवन में क्यों आवश्यक है क्यों महत्वपूर्ण है क्यों एक जिम्मेदार इंसान को अनुशासन में रहना आवश्यक है हर व्यक्ति की अपनी अपनी सोच और अपने अपने मत है किसी का मानना है कि अनुशासित व्यक्ति को देखकर समाज भी उसका अनुसरण करता है। तो कुछ लोगों का कहना है अनुशासन जीवन को नई दिशा देता है और समझदारी की सोच देता है।

    अनुशासन से समझ आती है जीवन के मूल्यों के बारे में क्या आवश्यक है क्या अनावश्यक है। इस सबसे अलग अनुशासन हमें शांत और स्थिर रहना सिखाता है। अनुशासन मनुष्य को अंदर से इतना विकसित कर देता है कि चाहे कोई भी परिस्थिति हो वह अपनी स्थिरता को नहीं खोता।

  • अकबर बीरबल की कहानी (उचित न्याय)

    बीरबल

    बीरबल जो काफी चतुर,होशियार, वहुप्रतिभाशाली और हर कार्य में निपुण थे इसी कारण राजा अकबर को बीरबल अधिक प्रिय थे। बीरबल दरबार की शोभा तो बढ़ाते उसके अलावा दरबार में न्याय की गुहार करने वालों को उचित न्याय दिलाने में मंत्रियों के सहायक बनते ।

    राजा अकबर

    राजा अकबर को बीरबल अत्यंत प्रिय थे । जब कभी भी राजा अकबर को कोई समस्या या चिंता होती तो अपनी समस्या और चिंता को लेकर बीरबल के पास पहुंचते और बीरबल द्वारा बताई सलाह पर अमल करते जो सही होतीं। ऐसे कई कारण थे ।जब राजा अकबर को बीरबल की सलाह लेनी पड़ी।

    कहानी

    एक बार की बात है जब बहुत अधिक सर्दी पड़ रही थी राजा अकबर ने ऐलान करवाया की जो भी महल के नजदीक वाली सरोवर के ठंडे पानी में रात भर खड़े रहेगा तो उसे इनाम में सौ सोने की मुद्राएं मिलेंगी ।ऐसा सुनकर नगर वासी आपस में बातचीत करने लगे की ऐसे जाड़े के दिनों मे जब कोहरा भी पढ रहा है कौन पूरी रात के लिए सरोवर की ठंडे पानी में खड़ा रह सकता है जिसे अपनी जान प्यारी ना हो वही ऐसा कर सकता है।

    राजा अकबर के महल के पास ही एक बेहद गरीब परिवार रहता था परिवार के मालिक ने जब यह ऐलान सुना तो उसने सोचा कि मुझे इस वक्त रूपए पैसे की बहुत सख्त जरूरत है इसलिए मैं उस सरोवर के ठंडे पानी में रात भर खड़े रहूंगा यह सोचकर वह राजा अकबर के महल की तरफ चल दिया।

    राजा के मंत्रियों ने उस गरीब को वह सरोवर दिखाई और उसमें खड़े होने के लिए कहने लगे और बताया कि अगर रात में ठंड के कारण तुम्हारी मृत्यु हो जाए तो उसका दोषी कोई नहीं माना जाएगा गरीब आदमी ने कहा कि ठीक है।

    सरोवर का पानी बहुत ठंडा था पर गरीब आदमी को पैसे की सख्त जरूरत थी इसलिए वो रात भर उस पानी में खड़ा रहा और जब सुबह हुई तब निकाल कर आया।

    राजा अकबर का दरबार लगा हुआ था और उस गरीब आदमी को शर्त के अनुसार 100 सोने की मोहरे दी जानी थी राजा ने पूछा क्या तुम्हें रात को अंधेरे में डर और ठंड नहीं लगी और कैसे तुमने पूरी रात पानी में खड़े होकर गुजारी इस पर उस गरीब ने कहा की राजाजी सरोवर से मुझे दूर एक घर में दिया जलता दिख रहा था उसकी रौशनी को देखते हुए मैंने पूरी रत ठंडे पानी में खड़े होकर गुजार दी।

    अकबर ने कहा तुमने शर्त पूरे नियम से नहीं की इसलिए तुम्हें इनाम नहीं दिया जाएगा और शर्त तोड़ने की वजह से तुम्हें 100 कौड़े मारे जाएंगे।

    बीरबल को यह बात उचित नहीं लगी और बीरबल चुपचाप से दरबार छोड़कर चले गए।

    अगले दिन राजा अकबर का दरबार लगा सारे मंत्री आ चुके थे और राजा अकबर भी गद्दी पर बैठे थे परंतु बीरबल कहीं नहीं दिखाई दे रहे थे राजा अकबर ने मंत्री से पूछा की बीरबल क्यों नहीं आए। इस पर मंत्रीने कहा की बीरबल अपने घर पर खिचड़ी बना रहे हैं और उन्होंने संदेश भिजवाया है जैसे ही खिचड़ी बन जाएगी वह दरबार में आ जाएंगे।

    अगले दिन फिर दरबार लगा परंतु बीरबल नहीं आए राजा अकबर ने फिर पूछा और फिर वही जवाब मिला की खिचड़ी बनते ही बीरबल आ जाएंगे ऐसा कुछ दिन चला पर बीरबल नहीं आए ।अंत में राजा अकबर ने कहा में स्वयं जाऊंगा बीरबल के घर और देखूंगा कि बीरबल कौन सी खिचड़ी पका रहे हैं जो कि इतने दिनों से नहीं बनी यह कहकर वह बीरबल के घर चल दिए।

    बीरबल अपने घर के पिछवाड़े में बैठे हुए थे और चूल्हे में आग लगने से बहुत धुआं ही धुआ था ।अकबर ने देखा के नीचे चूल्हे में आग लगी थी और दूर पेड़ पर हांडी लटकी हुई थी जिसमें खिचड़ी पकने रखी हुई थी।

    यह देखकर अकबर को पहले खूब हंसी आई और फिर कहा बीरबल इस तरह खिचड़ी कब तक बनेगी क्या इतनी दूर से हांडी गरम हो जाएगी तो इस पर बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा क्यों नहीं राजा जी जब सरोवर में खड़े होकर दूर से जलते दिये कि लौ देखकर उस गरीब को गर्माहट मिल सकती है तो मेरी खिचड़ी भी पक जाएगी ।राजा अकबर सारी बात समझ गए और चुपचाप अपने महल लौट गए।

    अगले दिन दरबार में उस गरीब व्यक्ति को बुलाया गया और उससे माफी मांगी गई और इनाम की सौ सोने की मोहरें भी दी गई।

    इस तरह बीरबल मैं एक उचित न्याय किया और उस गरीब को उसका इनाम भी दिलवाया ।

  • सवाल भारतीय नागरिकता का

    कोई भी राष्ट्रीय या देश सीमाओं को सुरक्षित रखने से ही मजबूत नहीं हो जाता बल्कि स्पष्ट कानून शुभ व्यवस्थित नागरिक व्यवस्था से भी बनता है।

    जरा सोचिए राज्य अपने नागरिकों को कैसे पहचानता है क्या राज्य किसी व्यक्ति को जीवन वृत ,जन्म परिवार ,सामाजिक उपस्थिति और सार्वजनिक सहभागिता के माध्यम से जानता है। या फिर राज्य समय-समय पर यह अपेक्षा करता है व्यक्ति स्वयं ही अपने अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करें?

    स्थाई नागरिकता प्रमाण पत्र का उद्देश्य प्रत्येक भारतीय नागरिक की कानूनी पहचान को स्पष्ट और प्रामाणिक बनाना हो सकता है।

    अनुच्छेद 11 के अंतर्गत सांसद ने नागरिकता अधिनियम 1955 बनाया जिसमें नागरिकता अर्जित करने के विभिन्न आधार तय किए गए जैसे की -जनम, वंश ,पंजीकरण देशीयकरण और क्षेत्रीय विलय । सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारत देश कोई ऐसा दस्तावेज विकसित नहीं कर सका जो दस्तावेज नागरिकता के लिए अंतिम प्रमाण पत्र कहा जा सके।

    हालांकि भारतीय नागरिक के पास मतदाता पहचान पत्र ,आधार कार्ड, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, भूमि के कागजात जैसे कई साक्ष्य हैं परन्तु फिर भी इनमें से कोई भी साक्ष्य भारतीय नागरिकता का अंतिम साक्ष्य नहीं है।

    नागरिकता का प्रश्न किसी साक्ष्य के लिए नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास से है ।

    अब समय है भारतीय नागरिकता के प्रश्न को विवाद से नहीं बल्कि कानून द्वारा और संस्थागत सुधार की दृष्टि से सुलझाया जाए और समस्या समझने का है साथ ही साथ आवश्यकता है किसी भी व्यवस्था को बनाते समय संविधान में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों गोपनीयता और नागरिक हितों का सम्मान किया जाए।

  • चिड़चिड़ापन रहना

    आज के वक्त में लगभग हर दूसरा व्यक्ति शायद जोर से चिल्लाता हुआ मिले अशांत या फिर गुस्सा मिले।आखिर कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है बेवजह की बात पर चीखना चिल्लाना ऊंचे स्वर में बात करना ।

    हर वक्त चिंतित रहना अकेले रहना किसी की बात को पसंद ना करना और किसी भी कार्य को समय पर ना कर पाना क्या ऐसा आपके साथ भी होता है अगर हां तो यह समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं है।

    समाज में ,परिवार में, रिश्तेदारी में ऐसा कुछ न कुछ होता ही रहता है जो कि हमें चिंता देता है और जिससे हम बेवजह की चिंता में डूब जाते हैं जिससे हमें कोई लेना देना नहीं होता।

    इस सब का असर हमारे स्वस्थ्य पर हमारे दैनिक जीवनचर्या पर और हमारे निजी जीवन पर पड़ता है । स्वास्थ्य का देखा जाए तो कमजोरी आना ब्लड प्रेशर जैसी परेशानी होना नींद कम होना बालों का झड़ना ऐसी बहुत सी स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां तनाव के कारण होने लगती हैं।

    कुछ लोगों में मानसिक बीमारी के लक्षण भी दिखने लगते हैं और फिर इलाज और दवाओं का लेना बस यही रह जाता है।

    पर क्या इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं है।अगर हम चाहे हमें समय रहते सावधान होना होगा हमें समझना होगा अपने जीवन की महत्वपूर्णता को और खुद को रोकना होगा बेवजह की चिंता लेने से और कभी-कभी चिड़चिड़ापन लेने की वजह घर का अशांत माहौल भी हमें परेशानी देता है ऐसी कई स्थितियां है जो हमें मानसिक विकार देती है

    इसलिए खुद को और अपनों को ऐसे माहौल से दूर रखिए जो कि आपके लिए आपके परिवार के लिए नुकसान दायक है।

  • बचपन छीनता सोशल मीडिया

    आज का वक्त सोशल मीडिया का वक्त है। यह हम सब अच्छे तरीके से जानते हैं । आज हमारे चारों तरफ सोशल मीडिया की झलक दिखती है। क्या फैशन में चल रहा है। क्या चीज ट्रेंड में चल रही है इस सब का सोशल मीडिया से पता चल जाता है।

    सोशल मीडिया पर हर वर्ग का व हर उम्र का व्यक्ति दिख जाएगा। सोशल मीडिया से आज के वक्त में कोई भी अछूता नहीं रहा है सीधे और साफ शब्दों में कहा जाए तो सोशल मीडिया हमारे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा बन गया है।

    पर क्या कभी सोचा है सोशल मीडिया का बच्चों पर क्या असर पड़ेगा और शोशल मीडिया बच्चों के लिए कितना फायदेमंद है और कितना नुक़सान दायक है।बच्चे जो अभी 8 से 14 साल की उम्र के हैं जिनको अभी अच्छे बुरे को ठीक तरह से समझने की समझ नहीं है। इस उम्र के बच्चों का अभी शारीरिक-मानसिक ‌विकास हो रहा है उस उम्र पर बच्चों को सोशल मीडिया पर समय बिताने की आदत पड़ जाए तो क्या होगा उनका भविष्य क्या उनका भविष्य खतरे में है यह सोचना होगा।

    आज के समय में सोशल मीडिया की लत किसी नशे से कम नहीं है। सोशल मीडिया की पड़ती लत से बच्चों का भविष्य खतरे में है और सोशल मीडिया से बच्चों को मानसिक खतरा भी है क्योंकी सोशल मीडिया की वजह से हमारे दिमाग को खुशी मिलती है और इससे डोपामाइन बनता है। और बार-बार उस अनुभव को पाने का मन करता है और इसी वजह से सोशल मीडिया की लत पड़ जाती है ठीक ऐसे ही बच्चों के साथ होता है।

    स्थिति बहुत खतरनाक होती जा रही है क्योंकि आज के बच्चों का बचपन सोशल मीडिया ने छीन सा लिया है। अब बच्चों का बाहर घूमने और खेलने का मन ना के बराबर करता है। हर वक्त किसी न किसी बहाने बच्चों को स्मार्टफोन चाहिए।

    शोशल मिडिया की लत बढ़ने की वजह से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा होना जैसा व्यवहार बढ़ रहा है। बच्चों का हद से ज्यादा शोशल मीडिया पर समय बिताने से आने वाले समय में बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और मस्तिष्क के लिए ख़तरनाक हो सकता है।